
इन हाथो से कुछ लिखा ,
उस लिखे को मिटाने के बहाने रोय।
जुबा से कुछ कहा,
अज फिर उस कहे को जुबा पर लाने के बहाने रोये।
जला दिये थे जो राज़ जिन्दगी से,
आज फिर उन्हे सिने से लगाने के बहाने रोये।
बस इस रोने की तसवीर को अक्सर,
बारिश की आड़ में छुपाने के बहाने रोये।
