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Friday, April 1, 2011

इन हाथो से कुछ लिखा


इन हाथो से कुछ लिखा ,

उस लिखे को मिटाने के बहाने रोय।

जुबा से कुछ कहा,

अज फिर उस कहे को जुबा पर लाने के बहाने रोये।

जला दिये थे जो राज़ जिन्दगी से,

आज फिर उन्हे सिने से लगाने के बहाने रोये।

बस इस रोने की तसवीर को अक्सर,

बारिश की आड़ में छुपाने के बहाने रोये।

वक्त को फुरसत नही...


वक्त को फुरसत नही हमे रूलाने से,

अब करे भी तो क्या गीला करे जमाने से।